
विश्व लिंफेडेमा दिवस पर विशेष
लखनऊ। विश्व लिम्फेडेमा दिवस पर फाइलेरिया के मरीजों के जज़्बे को सलाम करते हुए राज्य फाइलेरिया अधिकारी ने कहा कि विभाग 2004 से इस बीमारी के उन्मूलन के लिए कई कोशिशें कर रहा है, लेकिन जब मरीज़ आगे आए और खुद और कार्यक्रम में इसके योगदान को समझा, तभी हम संक्रमण को कम कर पाए और पूरे भरोसे के साथ इसे खत्म करने की तरफ बढ़ पाए। 2021 की गर्मियों तक यह सच्चाई नहीं थी, जब कानपुर, देवरिया, बलिया और लखनऊ के फाइलेरिया के मरीज़ सामने आने लगे, बोलने लगे, अपने अनुभव साझा करने लगे और खुद को ठीक करने और देखभाल करने, लिम्फेडेमा को बढ़ने से रोकने के लिए पेशेंट सपोर्ट ग्रुप (पीएसपी) बनाने लगे और फिर फाइलेरिया खत्म करने में समुदाय की भागीदारी को मज़बूत करने के लिए हेल्थ सिस्टम और खास स्टेकहोल्डर्स के साथ हाथ मिलाया। आज वे समझ और विवेक की आवाज़ हैं और सभी बदलाव लाने वाले लोगों की तरह समुदाय को हेल्थ सिस्टम के साथ पार्टनरशिप करने और सही प्रोफिलैक्सिस से नए संक्रमण को रोककर बीमारी को हराने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
बाराबंकी के टीपहर गांव के 81 साल के बाबादीन इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। वह लोगों से सीधे कहते हैं – अगर आप मेरी जैसी ज़िंदगी नहीं जीना चाहते, तो प्लीज़ दवा ले लीजिए। मेरी हालत देखिए और फिर तय कीजिए कि फाइलेरिया रोधी दवा लेनी है या नहीं। जब वह लोगों को यह बताते हैं, तो गांव के लोग उनकी बात ध्यान से सुनते हैं। पिछले 15 सालों से फाइलेरिया से पीड़ित बाबादीन ने अब अपने अनुभव को जागरूकता के संदेश में बदल दिया है। एमडीए अभियान के दौरान, वह स्वास्थ्य कर्मियों और CHO-PSP सदस्यों के साथ दूर-दराज के घरों और ईंट भट्टों पर गए और लोगों को दवा लेने के लिए प्रेरित किया। उनकी बढ़ती उम्र और बीमारी के बावजूद, उनकी कोशिशें लोगों के दिलों तक पहुंचीं। कई परिवारों ने पहली बार बड़े पैमाने पर दवा लेने में हिस्सा लिया।
विश्व लिंफेडेमा दिवस के अवसर पर बाबादीन जैसे मरीज यह साबित कर रहे हैं कि फाइलेरिया उन्मूलन की लड़ाई केवल स्वास्थ्य कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि मरीजों की भागीदारी और समुदाय के सहयोग से ही मजबूत बनती है। फाइलेरिया ऐसी बीमारी है जो केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं देती, बल्कि लंबे समय तक व्यक्ति के जीवन, कामकाज और सामाजिक सम्मान को भी प्रभावित करती है। लिंफेडेमा की स्थिति में हाथ या पैर में स्थायी सूजन आ जाती है, जिससे सामान्य जीवन जीना भी कठिन हो जाता है।
प्रदेश में फाइलेरिया उन्मूलन के लिए अपनाई गई बहुआयामी रणनीति के सकारात्मक परिणाम आए हैं। पहले जहां 51 जिलों में व्यापक अभियान चलाया जाता था, इस बार वह केवल 21 जिलों में केंद्रित रहा। लेकिन यह बदलाव केवल सरकारी कार्यक्रमों का परिणाम नहीं है। गांवों में आज फाइलेरिया को लेकर जो चर्चा हो रही है, वह समुदाय के भीतर विकसित हुए विश्वास, संवाद और सामूहिक जिम्मेदारी का परिणाम है। इसमें फाइलेरिया के मरीज़ अब जागरूकता दूत की भूमिका निभा रहे हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों की अगुवाई में बने रोगी हितधारक मंच ने न केवल फाइलेरिया उन्मूलन अभियान को नई दिशा दी है बल्कि बाबादीन जैसे फ़ाइलेरिया मरीज को मकसद भी दिया है।
सामुदायिक मंचों से मजबूत हुआ अभियान
राज्य फाइलेरिया अधिकारी डॉ. एके चौधरी बताते हैं कि इन मंचों के माध्यम से मरीज, स्वास्थ्यकर्मी और समुदाय एक साथ बैठकर न केवल बीमारी पर चर्चा करते हैं, बल्कि समाधान की दिशा में भी काम करते हैं। इन मंचों के माध्यम से कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं – फाइलेरिया को लेकर फैले मिथकों और डर में कमी आई है और सामूहिक दवा सेवन के प्रति स्वीकृति बढ़ी है। जिस कारण फाइलेरिया उन्मूलन अब केवल स्वास्थ्य विभाग का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि जनभागीदारी से चलने वाला सामुदायिक अभियान बन गया है।
लखनऊ में वर्तमान चरण में केवल मॉल ब्लॉक में आईडीए अभियान संचालित किया जा रहा है। यहां आयुष्मान आरोग्य मंदिरों पर कार्यरत सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों की अगुवाई में बने रोगी हितधारक मंच ने फाइलेरिया से प्रभावित लोगों को एक ऐसा मंच दिया है, जहां वे अपनी समस्याएं साझा कर सकते हैं और एक-दूसरे का मनोबल बढ़ा सकते हैं। पीएसपी से जुड़ी नारायणपुर गांव की 50 वर्षीय कमला पिछले लगभग 20 वर्षों से फाइलेरिया से प्रभावित हैं। उनका दाहिना हाथ प्रभावित होने के कारण रोजमर्रा के काम उनके लिए चुनौती बन गए हैं। कमला बताती हैं,“हमारे समय में न तो दवा मिलती थी और न सही जानकारी। जिसने जहां बताया, वहीं इलाज कराया। पूरा जीवन जिम्मेदारियों में निकल गया।” स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत के बाद उन्हें पता चला कि नियमित दवा सेवन से इस बीमारी से बचाव संभव है। अब कमला स्वयं गांव में लोगों को दवा सेवन के लिए प्रेरित करती हैं। वे कहती हैं, “जब आशा कार्यकर्ता दवा खिलाने आएं, तो हर हाल में दवा जरूर खाइए। पहले शरीर है, तभी काम है।” फाइलेरिया को लेकर कमला की बदली हुई सोच अब पूरे गांव में जागरूकता की आवाज बन गई है।
1736 मरीज़ फ़ाइलेरिया उन्मूलन की मुहिम से जुड़े
वर्तमान में प्रदेश के फाइलेरिया प्रभावित 19 जिलों के 87 ब्लॉकों में सीएचओ-पीएसपी मंच सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। इन मंचों में 1736 रोगी सदस्य शामिल हैं। स्वयं सहायता समूह, ग्राम प्रधान, कोटेदार, शिक्षक और स्थानीय स्वयंसेवक भी इस पहल से जुड़कर अभियान को मजबूत बना रहे हैं। सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च के सहयोग से गठित ये मंच यह दिखा रहे हैं कि जब समुदाय स्वयं स्वास्थ्य अभियानों की जिम्मेदारी उठाता है तो फाइलेरिया उन्मूलन जैसे बड़े लक्ष्य भी संभव हो जाते हैं।


