उत्तर प्रदेश

समकालीन दर्शन में भाषा-अध्ययन की प्रासंगिकता पर मंथन 

प्रो राजेंद्र कुमार वर्मा के संयोजन में लखनऊ विश्वविद्यालय में जुटे देशभर के दर्शन शास्त्र विशेषज्ञ  

लखनऊ। तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “भाषा का दर्शन: भारतीय एवं पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य” का आयोजन दर्शनशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा 20–22 फरवरी 2026 को  कुलपति के संरक्षण में किया गया। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. राजेश्वर प्रसाद यादव (अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग) तथा आयोजन सचिव प्रो. राजेंद्र कुमार वर्मा थे। 

यह कार्यक्रम भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर) के सहयोग से आयोजित हुआ। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरविंद मोहन ने की तथा विशेष अतिथि के रूप में आईसीपीआर के सदस्य-सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा उपस्थित रहे।

उद्घाटन सत्र में प्रो. आर.पी. यादव ने स्वागत वक्तव्य देते हुए समकालीन दर्शन में भाषा-अध्ययन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्तव्य प्रो. बी.के. अग्रवाल ने प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य भाषा-दर्शन की प्रमुख बहसों का विश्लेषण किया। प्रधान भाषण प्रो. अशोक वोहरा (पूर्व प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने दिया और विश्लेषणात्मक दर्शन में संकल्पनात्मक स्पष्टता के महत्व को रेखांकित किया। मुख्य अतिथि प्रो. रूप रेखा वर्मा (पूर्व कुलपति, लखनऊ विश्वविद्यालय) ने परंपराओं के बीच संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।

तीन दिनों में सात तकनीकी सत्र आयोजित हुए, जिनमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों—जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय तथा बिहार के विश्वविद्यालयों—के विद्वानों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

22 फरवरी को आयोजित समापन सत्र में प्रो. वाई.पी. सिंह मुख्य अतिथि रहे। प्रो. आर.पी. यादव ने संगोष्ठी प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा प्रो. राजेंद्र कुमार वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। प्रतिभागियों के लिए विश्वविद्यालय अतिथि-गृह में आवास एवं भोजन की व्यवस्था की गई।

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